लातूर, 12 दिसंबर 2025: भारतीय राजनीति के एक प्रमुख स्तंभ और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शिवराज पाटिल का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। 90 वर्षीय पाटिल ने महाराष्ट्र के अपने पैतृक स्थान लातूर में अपने निवास ‘देवघर’ में थोड़ी बीमारी के बाद अंतिम सांस ली। परिवार के स्रोतों ने इसकी पुष्टि की है। उनका निधन राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर ला गया है, जहां वे हमेशा गरिमा और विद्वता के प्रतीक के रूप में जाने जाते थे।
शिवराज पाटिल के परिवार में उनका बेटा शैलेश पाटिल, बहू अर्चना (जो भाजपा की नेता हैं) और दो पोतियां बची हैं। अर्चना का भाजपा से जुड़ाव राजनीतिक परिवार की विविधता को दर्शाता है, लेकिन पाटिल स्वयं हमेशा कांग्रेस के प्रति निष्ठावान रहे। उनका निधन न केवल परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है, बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए भी एक बड़ा नुकसान साबित हुआ है।

पाटिल का राजनीतिक सफर लंबा और प्रेरणादायक रहा। वे 2004 से 2008 तक केंद्रीय गृह मंत्री रहे, जब देश की आंतरिक सुरक्षा उनके हाथों में थी। इससे पहले, 1991 से 1996 तक वे लोकसभा के 10वें स्पीकर के रूप में सेवा दे चुके थे। 2010 से 2015 तक वे पंजाब के राज्यपाल भी रहे और चंडीगढ़ के केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभाई। इन सभी भूमिकाओं में उन्होंने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की और शासन को मजबूत बनाने में योगदान दिया।

12 अक्टूबर 1935 को जन्मे पाटिल ने अपनी राजनीतिक यात्रा लातूर के नगर परिषद प्रमुख के रूप में शुरू की। 1970 के दशक में वे विधायक बने और बाद में लातूर लोकसभा सीट से सात बार चुनाव जीते। हालांकि, 2004 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा की रूपatai पाटिल निलंगेकर से हार गए। फिर भी, उनकी राजनीतिक विरासत अटल रही। एक पार्टी नेता ने कहा कि पाटिल हमेशा गरिमापूर्ण आचरण के लिए प्रसिद्ध रहे। उन्होंने न तो सार्वजनिक भाषणों में और न ही निजी बातचीत में कभी व्यक्तिगत हमले किए।
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पाटिल की एक और खासियत थी उनकी व्यापक पढ़ाई और गहन अध्ययन। वे मराठी, अंग्रेजी और हिंदी पर पूर्ण रूप से अधिकार रखते थे। संवैधानिक मामलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें समकालीन सांसदों में अलग स्थान देती थी। पार्टी नेता ने जोड़ा कि उनकी वाक्पटुता और प्रस्तुति हमेशा प्रभावशाली रही, जो सदन की बहसों को समृद्ध करती थी। ऐसे व्यक्तित्व का जाना राजनीति में शालीनता की कमी को और उजागर करता है।
शिवराज पाटिल का निधन एक ऐसे दौर में हुआ है जब राजनीति में गरिमा और ज्ञान की कमी खल रही है। उनके जैसे नेता दुर्लभ होते हैं, जो सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी सादगी बनाए रखते थे। लातूर और महाराष्ट्र के लोग उन्हें एक सच्चे सेवक के रूप में याद रखेंगे। उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
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