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बिहार राजनीति में नया मोड़: उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो का भाजपा में विलय प्रस्ताव, राज्यसभा सीट से जुड़ी चर्चाएं तेज

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पटना, 2 मार्च 2026: बिहार की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक प्रस्ताव चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के विलय का सुझाव दिया है। यह बात अब राज्यसभा चुनाव के साथ जुड़कर और गंभीर हो गई है। रालोमो के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने वाला है, और नामांकन की अंतिम तिथि 5 मार्च तय है। ऐसे में इस प्रस्ताव को राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

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भाजपा की ओर से यह संकेत आया है कि यदि रालोमो का विलय होता है, तो कुशवाहा को राज्यसभा भेजने में सहयोग किया जा सकता है। सियासी हलकों में इसकी चर्चा जोरों पर है, क्योंकि इससे भाजपा को सदन में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। साथ ही, रालोमो के सामाजिक आधार, खासकर पिछड़े वर्गों को अपने संगठन में शामिल करने का फायदा भी।

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हालांकि, कुशवाहा ने पहले जदयू छोड़ते समय कहा था कि वे गठबंधन तो कर सकते हैं, लेकिन भाजपा की सदस्यता नहीं लेंगे। यह पुराना बयान अब फिर से सामने आ रहा है, जो विलय की राह में चुनौती पेश कर सकता है। यदि कुशवाहा इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो यह उनके राजनीतिक रुख में बदलाव के रूप में देखा जाएगा। वहीं, ठुकराने की स्थिति में राज्यसभा में उनकी वापसी अनिश्चित हो सकती है।

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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा इस कदम से दोहरा लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। एक तरफ राज्यसभा में संख्याबल बढ़ाना, दूसरी तरफ रालोमो के वोट बैंक को मजबूत करना। बिहार में राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया चल रही है, और 5 मार्च की डेडलाइन से दबाव बढ़ रहा है। इस बीच, कुशवाहा की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सियासी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बातचीत जारी है।

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यह घटनाक्रम बिहार की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। रालोमो के विलय से भाजपा का आधार और विस्तारित हो सकता है, जबकि कुशवाहा के लिए यह राज्यसभा सीट हासिल करने का रास्ता बन सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें 5 मार्च पर टिकी हैं, जब नामांकन दाखिल होंगे। यदि विलय होता है, तो यह बिहार एनडीए गठबंधन में नई मजबूती ला सकता है।

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बिहार में ऐसे राजनीतिक प्रस्ताव अक्सर चुनावी मौसम में सामने आते हैं, लेकिन इस बार राज्यसभा से जुड़ाव इसे अलग बनाता है। कुशवाहा की पार्टी रालोमो मुख्य रूप से कुशवाहा समुदाय पर आधारित है, और इसका विलय भाजपा की पिछड़े वर्गों में पैठ बढ़ा सकता है। हालांकि, विलय की प्रक्रिया में कानूनी और संगठनात्मक पहलू भी महत्वपूर्ण होंगे।

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कुशवाहा ने हाल के महीनों में बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई है, और राज्यसभा से उनका जुड़ाव जारी रहना उनके लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा की रणनीति से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यह प्रस्ताव दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर रखा गया है। आने वाले दिनों में यदि कोई फैसला होता है, तो यह बिहार की सियासत में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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राजनीतिक दलों के बीच ऐसे विलय या गठबंधन बिहार में आम हैं, लेकिन इस बार समय की तंगी इसे और दिलचस्प बना रही है। रालोमो कार्यकर्ताओं में भी इस प्रस्ताव को लेकर चर्चाएं हैं, और वे कुशवाहा के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। राज्यसभा चुनाव के नतीजे 15 मार्च को आएंगे, लेकिन नामांकन से पहले का यह दौर निर्णायक साबित हो सकता है।


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