पटना, 10 दिसंबर 2025: बिहार की शराबबंदी नीति, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सबसे बड़ा दांव मानी जाती है, एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने गया में एक कार्यक्रम के दौरान ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक हलकों में हंगामा मचा दिया। उन्होंने कहा कि शराबबंदी तो अच्छी बात है, लेकिन इसका क्रियान्वयन ऐसा होना चाहिए कि गरीब मजदूरों पर अन्याय न हो। मांझी ने सुझाव दिया कि महुआ और ईख से बनी देसी शराब पीने में कोई नुकसान नहीं, बल्कि फायदा होता है। उनका यह बयान सुनते ही विपक्ष ने हमला बोल दिया, जबकि एनडीए के अंदर भी असहजता की खबरें आने लगी हैं।

कार्यक्रम में बोलते हुए जीतन राम मांझी ने कहा, “कोई मजदूर काम करते हुए शराब पीकर भी अपना काम कर रहा है, तो उसे पकड़ना नहीं चाहिए। हमारे पिता शराब बनाते थे, महुआ और ईख का रस से बनाते थे। वह शराब पीने से फायदा होता था। वह शराब पीने से फायदा करेगा।” मांझी ने यह भी आरोप लगाया कि शराबबंदी का फायदा बड़े तस्करों को हो रहा है, जबकि छोटे किसान और मजदूर जेल की सजा काट रहे हैं। उन्होंने कहा कि रात 10 बजे के बाद बड़े लोग पीते हैं, लेकिन उन्हें कोई पकड़ता नहीं। यह बयान मांझी के मुसहर समाज की पृष्ठभूमि से जुड़ा लगता है, जहां पारंपरिक रूप से महुआ और ईख का उपयोग आम है। लेकिन बिहार सरकार की सख्त शराबबंदी नीति के बीच यह बात हलचल मचा रही है।
शराबबंदी 2016 से बिहार में लागू है, और नीतीश कुमार इसे महिलाओं की सुरक्षा का हथियार मानते हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह कानून गरीबों पर ज्यादा सख्ती से लागू होता है। मांझी का बयान सुनकर जदयू के मंत्री श्रवण कुमार ने पलटवार किया। उन्होंने कहा, “शराबबंदी समाज के भले के लिए है। बड़े-छोटे का भेदभाव नहीं किया जाता। मांझी जी का बयान गलतफहमी पर आधारित लगता है।” विपक्षी आरजेडी ने इसे एनडीए का आंतरिक कलह बताया। नेता अब्दुल बरि सिद्दीकी ने कहा, “मांझी जी सही कह रहे हैं। नीतीश की शराबबंदी सिर्फ दिखावा है, असली माफिया खुले घूम रहे हैं।” मांझी के बयान ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या शराबबंदी को संशोधित करने की जरूरत है?

यह पहली बार नहीं जब मांझी ने शराबबंदी पर सवाल उठाए हैं। पहले भी वे कह चुके हैं कि देसी शराब को वैध बनाने पर विचार हो। लेकिन केंद्र में मंत्री होने के नाते उनका यह बयान नीतीश सरकार के लिए असहज है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मांझी अपनी दलित वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ऐसा कह रहे हैं, जहां शराबबंदी से असर पड़ा है। बिहार में शराबबंदी के तहत 5 लाख से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं, और जेलों में हजारों कैदी हैं। मांझी ने कहा कि तीसरी बार नीतीश कुमार ने शराबबंदी को सख्त किया है, लेकिन विसंगतियां बरकरार हैं।
जनता की राय बंटी हुई है। एक तरफ महिलाएं और सामाजिक संगठन शराबबंदी का समर्थन करते हैं, वहीं मजदूर वर्ग कहता है कि छोटी मात्रा में पीने से कोई गुनाह नहीं। मांझी का बयान बिहार की राजनीति को नई बहस दे गया है। क्या नीतीश कुमार इसका जवाब देंगे? या एनडीए में यह मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा? आने वाले दिनों में और सियासी तलवारें खिंच सकती हैं। बिहार की जनता इंतजार कर रही है कि शराबबंदी का असली चेहरा क्या है – समाज सुधार या राजनीतिक हथियार?
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