बक्सर (बिहार)। बिहार के बक्सर जिले के कृष्णाब्रह्म थाना अंतर्गत अरक गांव के डॉ. गणेश तिवारी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से अपनी पीएचडी उपाधि हासिल कर एक मिसाल कायम की है। 2020 में शुरू हुए उनके शोध कार्य का सफर 2025 में पूरा हुआ। इस दौरान उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) और सीनियर रिसर्च फेलोशिप (SRF) जैसी प्रतिष्ठित छात्रवृत्तियां भी मिलीं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर उच्च शिक्षा की इस ऊंचाई तक पहुंचना उनकी मेहनत और लगन का प्रमाण है।

डॉ. तिवारी के पिता श्री तारकेश्वर तिवारी हैं, जो गांव में ही रहते हैं। गणेश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई अरक गांव के सरकारी स्कूल से पूरी की। गांव के साधारण हालातों में पल-बढ़कर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। स्नातक की डिग्री के लिए वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) पहुंचे, जहां संस्कृत विषय में उन्होंने मजबूत आधार तैयार किया। उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से एमए पूरा किया। उच्च अध्ययन की राह में एमफिल भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही हासिल की। पीएचडी के लिए फिर वही विश्वविद्यालय चुना, जहां संस्कृत और प्राकृत अध्ययन पर उनका शोध केंद्रित रहा।
शोध के पांच वर्षों में डॉ. तिवारी ने सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने देशभर के कई विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में सेमिनारों और वर्कशॉप में हिस्सा लिया। रूस और वियतनाम जैसे देशों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी वे गए। वहां भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य और प्राकृत भाषा से जुड़े विषयों पर अपने पेपर पेश किए। इन अनुभवों ने उनके शोध को नई गहराई दी और उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।

2022 से वे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर के रूप में पढ़ा रहे हैं। अध्यापन का दायित्व निभाते हुए शोध और विदेश यात्राओं को संतुलित करना आसान नहीं था, लेकिन डॉ. तिवारी ने सब कुछ संभाला। उनका मानना है कि शिक्षा ही ग्रामीण युवाओं के लिए सशक्तिकरण का सबसे बड़ा माध्यम है। अरक गांव जैसे इलाकों से आने वाले छात्रों के लिए उनकी यह सफलता प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

परिवार, शिक्षकों, सहकर्मियों और गांव वालों ने उनकी इस उपलब्धि पर खुशी जताई। सबने उन्हें उज्ज्वल भविष्य की बधाई दी। डॉ. तिवारी का सफर बताता है कि साधना और संघर्ष से कोई लक्ष्य असंभव नहीं। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की इस तरह की कहानियां युवाओं में जोश भरती हैं। अब डॉ. तिवारी संस्कृत और भारतीय दर्शन के क्षेत्र में और योगदान देने को तैयार हैं, जो शिक्षा जगत के लिए सकारात्मक संकेत है।
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