नई दिल्ली, 20 दिसंबर 2025: उत्तर भारत में हर साल अक्टूबर से दिसंबर तक पराली जलाने से फैलने वाला धुआं एक बड़ी समस्या बना रहता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में धान की फसल कटने के बाद किसान पराली को आग लगा देते हैं, जिसका असर दिल्ली-एनसीआर और पूरे इंडो-गंगेटिक प्लेन की हवा पर पड़ता है। लेकिन हाल के वर्षों में इस प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव देखा गया है, जो वैज्ञानिकों को भी हैरान कर रहा है। किसान अब पराली दोपहर की बजाय शाम के समय जला रहे हैं, जिससे कई घटनाएं सैटेलाइट की नजर से बच जाती हैं।

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि ज्यादातर पराली दोपहर 1 से 2 बजे के बीच जलाई जाती है। इसी समय नासा के सैटेलाइट जैसे MODIS सेंसर धरती की निगरानी करते हैं और आग के डेटा रिकॉर्ड करते हैं। लेकिन नासा से जुड़े वायुमंडलीय वैज्ञानिक हिरेन जेठवा के अनुसार, अब किसान शाम 4 से 6 बजे के बीच ऐसा कर रहे हैं। इससे कई आग सैटेलाइट के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो पातीं, जबकि जमीन पर धुआं फैलता रहता है।

इस बदलाव का खुलासा दक्षिण कोरिया के GEO-KOMPSAT-2A सैटेलाइट से हुआ, जो हर 10 मिनट में डेटा इकट्ठा करता है। इसके विश्लेषण से पता चला कि पराली जलाने का पीक टाइम दोपहर से शाम की ओर शिफ्ट हो गया है। ISRO और iForest जैसी संस्थाओं के अध्ययन भी यही संकेत देते हैं। आंकड़ों से साफ है कि 2020 में चरम समय दोपहर 1:30 बजे था, लेकिन 2024 तक यह शाम 5 बजे के आसपास पहुंच गया।

साल 2025 में पराली जलाने की घटनाएं मध्यम स्तर पर रहीं। यह 2021, 2022 और 2023 से बेहतर लेकिन 2024 और 2020 से खराब रहा। नवंबर 2025 में कई दिनों तक दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 400 से ऊपर रहा, जिससे स्कूल बंद करने पड़े और निर्माण कार्य रुक गए। दिसंबर में भी दिल्ली के कई इलाकों में AQI 500 से ज्यादा दर्ज किया गया।
शाम को पराली जलाने से समस्या और गंभीर हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पराली का धुआं अकेला जिम्मेदार नहीं होता; इसमें वाहनों, फैक्ट्रियों, घरेलू ईंधन, पटाखों और धूल का प्रदूषण भी जुड़ जाता है। किसी एक दिन पराली का योगदान 40 से 70 प्रतिशत तक हो सकता है, जबकि पूरे मौसम में औसतन 20 से 30 प्रतिशत। शाम की आग ज्यादा खतरनाक साबित होती है क्योंकि रात में हवा की ऊंचाई कम हो जाती है और हवाएं धीमी पड़ जाती हैं। इससे प्रदूषण जमीन के पास फंस जाता है और सुबह तक हालात बिगड़ जाते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, किसान नासा को चकमा देने के लिए नहीं, बल्कि स्थानीय निगरानी, जुर्माने और कार्रवाई से बचने के लिए समय बदल रहे हैं। लेकिन इससे सैटेलाइट डेटा और जमीनी स्थिति के बीच फर्क बढ़ रहा है। वैज्ञानिक अब मानते हैं कि यह समय का खेल वायु प्रदूषण से लड़ाई को और जटिल बना रहा है। सरकार और एजेंसियां अब ज्यादा सतर्क निगरानी पर जोर दे रही हैं ताकि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके।
jansancharbharat.com पर पढ़ें ताजा एंटरटेनमेंट, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइस्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और हर खबर की अपडेट के लिए जनसंचार भारत को होम पेज पर जोड़ कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
Discover more from Jansanchar Bharat
Subscribe to get the latest posts sent to your email.









