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बक्सर: धान के कटोरे में मचा हाहाकार, बाढ़ और तूफान से किसानों की फसल तबाह; सोशल वर्कर की सरकार से गुहार

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बक्सर, 17 दिसंबर 2025: बिहार का धान का कटोरा कहे जाने वाले बक्सर जिले के ग्रामीण इलाकों में इस साल किसानों की हालत देखकर दिल दहल जाता है। लगातार बाढ़ और तूफान ने धान की फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। कई गांवों में चार-चार बार गंगा का पानी खेतों में घुस आया, सप्ताह भर तक रुका रहा और सारी मेहनत पानी में बह गई। उसके बाद आए तूफान ने जो बचा था, उसे भी खत्म कर दिया। खेतों में अभी भी कीचड़ जमा है, हार्वेस्टर बेकार पड़े हैं, और मजदूर हाथ से धान काटने को मजबूर हैं। लेकिन कटाई के बाद भी मुसीबत कम नहीं – धान की कीमत रोज गिर रही है, व्यापारी मनमाना दाम लगा रहे हैं। एक सोशल वर्कर ने इस बदहाली पर आवाज उठाते हुए कहा कि किसान अन्नदाता हैं, लेकिन आज वे खुद भूखे मरने की कगार पर हैं।

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सोशल वर्कर ने बताया कि मिठाई प्रखंड के कई गांवों में हालत सबसे खराब है। गंगा किनारे बसे इलाकों में पानी ने सब कुछ तबाह कर दिया। एक सप्ताह तक खेत डूबे रहे, फसल सड़ गई। तूफान ने बाकी को खत्म किया। खलिहान में जो धान पहुंच भी रहा है, वह गीला है। व्यापारी कम दाम दे रहे हैं, और किसान मजबूरी में बेच रहे हैं। सोशल वर्कर ने कहा, “किसान मजबूत हैं, घाटे में भी अगले साल की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन सरकार को जमीनी हकीकत देखनी चाहिए। मीडिया को भी गांवों में आकर देखना चाहिए कि अन्नदाता की हालत क्या है।”

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कई किसान अब खेती छोड़ने की सोच रहे हैं। जो समझदार हैं, वे अपनी जमीन 20-25 हजार रुपये बीघा पर बंदोबस्ती देकर दूसरा काम कर रहे हैं। लेकिन मजदूर वर्ग के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उनके पास खेती ही रोजी-रोटी है। घर में शादी, बीमारी या अन्य खर्च के लिए यही सहारा था। अब सब खत्म। सोशल वर्कर ने अपील की कि धान की खरीद जल्द शुरू हो, उचित दाम मिले, और बाढ़-तूफान से हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए। उन्होंने जिलाधिकारी और अन्य अधिकारियों से गांवों का दौरा करने की मांग की।

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यह हाल सिर्फ एक-दो गांव का नहीं, पूरे धान उत्पादक क्षेत्र का है। निरमा, बसोली जैसे इलाकों में 20-25 फीसदी कटाई हुई है, बाकी तबाह। किसान रोते हुए कह रहे हैं कि इस साल का घाटा कैसे भरेंगे? सोशल वर्कर ने कहा, “किसान आत्महत्या नहीं करेंगे, वे मजबूत हैं। लेकिन सरकार अगर नहीं जागी, तो मोह भंग हो जाएगा।” जिले में किसानों की यह पुकार सुनने की जरूरत है। यदि समय रहते मदद नहीं मिली, तो अन्नदाता का भविष्य अंधकार में डूब जाएगा।

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