बक्सर, 6 दिसंबर 2025: “हमने सरहद पर सीना तानकर गोली खाई… लेकिन आज अपने ही देश में एक डॉक्टर के लिए मोहताज हैं।” ये दिल दहला देने वाले शब्द बक्सर के उन 150 से ज्यादा पूर्व सैनिकों के हैं, जो पिछले 25 दिनों से ECHS पॉलीक्लिनिक के चक्कर लगा रहे हैं। 12 नवंबर से आज तक दोनों स्वीकृत मेडिकल ऑफिसर की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और सिर्फ एक दंत चिकित्सक को देखकर वे निराश होकर लौट रहे हैं। 40-40 किलोमीटर दूर से आने वाले ये वीर जवान, विधवा पेंशनर और बुजुर्ग सैनिक सुबह से लाइन में लगते हैं, लेकिन शाम को बिना दवा लिए घर वापस चले जाते हैं। आज आखिरकार उनकी एकजुट आवाज ने हलचल मचा दी। इंडियन एक्स-सर्विसमेन मूवमेंट (IESM) के नेतृत्व में दर्जनों पूर्व सैनिकों ने OIC कर्नल डी.एन. सिंह से सीधी मुलाकात की, और पांच बड़ी समस्याओं को टेबल पर रख दिया। मीटिंग का नतीजा सकारात्मक रहा – तत्काल कार्रवाई के वादे के साथ।
बक्सर जैसे छोटे शहर में ECHS पॉलीक्लिनिक पूर्व सैनिकों का एकमात्र सहारा है। यहाँ मलवीय नगर (धोबी घाट) गली नंबर-02, चरित्र बन में स्थित यह केंद्र सैकड़ों परिवारों की उम्मीद है। लेकिन पिछले 25 दिनों से डॉक्टरों की कमी ने सबको परेशान कर दिया। 12 नवंबर को एक मेडिकल ऑफिसर के स्थानांतरण के बाद दूसरा पद भी खाली हो गया, और अब सिर्फ दंत चिकित्सक ही उपलब्ध हैं। पूर्व सैनिकों का कहना है कि सामान्य बीमारियों – जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या पुरानी चोटों का इलाज – के लिए वे घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन सही सलाह नहीं मिलती। एक बुजुर्ग सैनिक ने बताया, “हमने देश की रक्षा की, अब बेटे-बेटियों की तरह सम्मान की उम्मीद थी। लेकिन यहाँ तो दवा तक नहीं मिल रही।”
समस्याएं डॉक्टरों की कमी तक सीमित नहीं हैं। रेफरल के नाम पर भी परेशानी है। पटना के पारस अस्पताल में भेजे जाने पर मरीजों से कहा जाता है, “दवा-इंजेक्शन बाहर से लाओ!” इससे आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। एम्बुलेंस का तो कोई हिसाब ही नहीं – कहाँ जा रही है, किसके लिए बुलाई गई, इसका कोई रजिस्टर नहीं। दवा काउंटर पर घंटों लाइन लगती है, स्टाफ की बदतमीजी से सिर चकराने लगता है, और कभी-कभी गलत दवा मिलने का डर रहता है। पूर्व सैनिकों ने लिखित शिकायतें दीं, लेटर सौंपे, लेकिन कोई सुनवाई न हुई। IESM के जिलाध्यक्ष सूबेदार हरेंद्र तिवारी ने कहा, “ये छोटी-छोटी बातें नहीं, हमारे सम्मान का सवाल है। जब तक आवाज न उठेगी, कुर्सी खाली ही रहेगी।”
आज सुबह IESM के चेयरमैन डॉ. मेजर पी.के. पाण्डेय, सूबेदार हरेंद्र तिवारी और दर्जनों वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पॉलीक्लिनिक पहुंचकर OIC कर्नल डी.एन. सिंह से मुलाकात की। मीटिंग में पांच मुख्य मुद्दे रखे गए: डॉक्टरों की कमी, रेफरल प्रक्रिया में पारदर्शिता, एम्बुलेंस का हिसाब-किताब, दवा काउंटर पर लाइन की समस्या और स्टाफ व्यवहार। कर्नल सिंह ने हर बिंदु को गंभीरता से सुना। मीटिंग के तुरंत बाद ये फैसले लिए गए:

- एम्बुलेंस का रजिस्टर: कल 7 दिसंबर से हर एम्बुलेंस की ड्यूटी का पूरा हिसाब रजिस्टर में दर्ज होगा। कोई मनमानी नहीं चलेगी।
- दवा काउंटर पर अतिरिक्त स्टाफ: सुबह के तीन घंटों में एक अतिरिक्त कर्मचारी लगेगा, ताकि लाइन कम हो और मरीजों को राहत मिले। यह कल से ही शुरू हो जाएगा।
- स्टाफ की बदतमीजी पर सख्ती: OIC ने साफ कहा, “ऐसी शिकायत दोबारा नहीं आएगी। दोषी पर कार्रवाई होगी।”
- डॉक्टरों की बहाली: दोनों मेडिकल ऑफिसर पदों पर जल्द भर्ती का लिखित आश्वासन। कर्नल सिंह ने बताया, “प्रक्रिया तेज की जा रही है, बहुत जल्द डॉक्टर आ रहे हैं।”
- शिकायतों पर कार्रवाई: सभी शिकायतों को गंभीरता से लिया गया। एक फॉलो-अप मीटिंग का भी वादा किया गया।
मीटिंग के बाद पूर्व सैनिकों के चेहरों पर राहत साफ झलक रही थी। लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी – “ये सिर्फ बक्सर की लड़ाई नहीं, पूरे देश के लाखों वीर जवानों की है।” डॉ. मेजर पी.के. पाण्डेय ने कहा, “हमने सरहद पर दुश्मन का सामना किया, अब अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे। ECHS जैसी योजनाएं हमारे लिए बनाई गई हैं, इन्हें मजबूत बनाना हमारा हक है।” सूबेदार तिवारी ने जोड़ा, “अगर हमारे जांबाजों का इलाज नहीं होगा, तो ‘जय जवान’ सिर्फ नारा बनकर रह जाएगा।”
यह घटना बक्सर तक सीमित नहीं। पूरे देश में ECHS पॉलीक्लिनिक्स में डॉक्टरों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। केंद्रीय संगठन ECHS के अनुसार, देशभर में 426 पॉलीक्लिनिक्स हैं, लेकिन स्टाफिंग की चुनौतियां बनी हुई हैं। भर्ती प्रक्रियाएं चल रही हैं, जैसे हाल ही में DEO, क्लर्क और मेडिकल स्टाफ के लिए 67 पदों पर भर्ती, लेकिन ग्रामीण इलाकों जैसे बक्सर में देरी हो जाती है। पूर्व सैनिकों का कहना है कि विधवा पेंशनरों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। एक विधवा ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “पति की शहादत के बाद पेंशन तो मिलती है, लेकिन इलाज के बिना क्या फायदा? हम लाइन में खड़े होकर थक जाते हैं।”
IESM जैसी संस्थाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। 2008 में स्थापित यह संगठन पूर्व सैनिकों की एकजुट आवाज है, जो पेंशन, स्वास्थ्य और कल्याण के मुद्दों पर लड़ता है। बक्सर इकाई ने आज साबित कर दिया कि एकजुटता से बदलाव संभव है। कर्नल डी.एन. सिंह ने मीटिंग के बाद कहा, “हम पूर्व सैनिकों का सम्मान करते हैं। ये सुझाव अमूल्य हैं, और हम इन्हें लागू करेंगे। ECHS का मकसद ही है कि वीर जवानों को घर जैसी सुविधा मिले।”
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पूर्व सैनिकों ने फैसला किया है कि वे नजर रखेंगे। अगर वादे पूरे न हुए, तो अगला कदम बड़ा होगा। एक सैनिक ने कहा, “हमने कभी हार नहीं मानी, न मानेंगे।” यह संघर्ष न सिर्फ बक्सर, बल्कि हर उस ECHS केंद्र की कहानी है जहाँ सुविधाओं की कमी है। देश के लाखों पूर्व सैनिकों को यह संदेश जाना चाहिए – एक साथ खड़े होकर लड़ो, तो जीत तुम्हारी होगी।
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