बक्सर (बिहार)। जहां कानून की किताबें खुलती हैं और न्याय की बहस चलती है, वहीं बक्सर व्यवहार न्यायालय के परिसर में इन दिनों इंसानियत की एक अनोखी कहानी लिखी जा रही है। कोर्ट के विशाल प्रांगण में वर्षों से रह रहे दर्जनों आवारा बेजुबान जानवरों और उनके शावकों को ठंड से बचाने के लिए कर्मचारियों और अधिवक्ताओं ने मानवीय पहल की है। बढ़ती सर्दी में इन निरीह प्राणियों को भोजन, आश्रय और कंबल मुहैया कराकर वे करुणा का संदेश दे रहे हैं।

यह पहल न्यायालय के चतुर्थवर्गीय कर्मचारी और रात्रि प्रहरी सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा उर्फ पालजी ने शुरू की। दिन हो या रात, वे रोज इन जानवरों को खाना खिलाते हैं। रात की ड्यूटी में जब पूरा परिसर सूना हो जाता है, तो ये बेजुबान उनके सबसे करीबी साथी बन जाते हैं। ठंड बढ़ने पर पालजी ने पेड़ के नीचे प्लास्टिक शीट से अस्थायी झोपड़ी बनाई, ताकि जानवर और उनके शावक रात में ठिठुरने से बच सकें। यह छोटा-सा ढांचा ठंड से राहत देने वाला आश्रय बन गया।

इस श्रृंखला में हाल ही में न्यायालय की अधिवक्ता संध्या जायसवाल जुड़ीं। डुमरांव स्टेशन रोड निवासी संध्या ने ठंड में ठिठुरते शावकों को देखकर दो कंबल दान किए। उन्होंने खुद कंबल बिछाए और ढके, ताकि जानवर सुरक्षित रहें। एक कंबल जमीन पर शावकों के लिए बिछाया गया, जबकि दूसरा छत पर डालकर झोपड़ी को और मजबूत बनाया गया। संध्या का कहना है कि कड़ाके की ठंड में बेजुबान सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं। वे अपनी पीड़ा बता नहीं पाते, इसलिए उन्होंने नियमित सेवा करने का फैसला लिया है।

ये जानवर दिन में कोर्ट परिसर को बंदरों से बचाते हैं और रात में प्रहरी के साथ रहते हैं। उनकी मौजूदगी से परिसर सुरक्षित रहता है। लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि वे इंसान और प्रकृति के बीच सेवा का रिश्ता सिखाते हैं। न्यायालय के कर्मचारी और अधिवक्ता बताते हैं कि ये प्राणी यहां के हिस्से बन चुके हैं। उनकी देखभाल से परिसर में सकारात्मक माहौल रहता है।
यह पहल दिखाती है कि न्याय केवल अदालती फैसलों तक नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना से भी जुड़ा है। बक्सर कोर्ट में कंबलों और आश्रय की यह छोटी कोशिश समाज को बड़ा संदेश दे रही है कि बेजुबान जीवों की सेवा ही असली इंसानियत है। ऐसे प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में पशु कल्याण की जरूरत को भी उजागर करते हैं। ठंड के मौसम में कई जगह आवारा जानवरों को सहारा देने की जरूरत होती है, और बक्सर की यह मिसाल दूसरों को प्रेरित कर सकती है।

स्थानीय लोग इस पहल की सराहना कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसे कदम से समाज में दया और जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है। अब देखना यह है कि यह मानवीय श्रृंखला और कितने लोगों तक पहुंचती है।
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