पटना, 6 दिसंबर 2025: बिहार विधानसभा के 18वें सत्र ने पिछले पांच दिनों में एक साफ संकेत दे दिया कि आने वाले पांच साल सदन की राजनीति कैसी चलेगी। सत्ता पक्ष की मजबूत पकड़ के आगे विपक्ष बहस तो कर सकता है, हंगामा मचा सकता है, वेल में आ सकता है या वॉकआउट कर सकता है, लेकिन किसी मुद्दे पर वोटिंग की मांग करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। द्वितीय अनुपूरक बजट पर कटौती प्रस्ताव की बहस हुई, लेकिन विपक्ष ने वोटिंग का आग्रह तक नहीं किया। वजह साफ है – संख्या का खेल। एनडीए के 202 विधायकों के मुकाबले विपक्ष के महज 41 ही हैं। यह असंतुलन सदन के हर कोने में दिख रहा है, और आगे भी यही तस्वीर बनी रहेगी।
सदन में विधायकों की संख्या ही असली ताकत है। चाहे बजट पास करना हो, बिल लाना हो या संशोधन की बात हो, मेजॉरिटी के बिना कुछ संभव नहीं। बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं। एनडीए के पक्ष में 202 विधायक हैं, जिनमें भाजपा के 89, जदयू के 85, लोजपा के 19, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के पांच और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार शामिल हैं। यह संख्या सरकार को हर कदम पर मजबूत बनाती है। विपक्ष की स्थिति उल्टी है। महागठबंधन के पास सिर्फ 35 विधायक हैं – राजद के 25, कांग्रेस के छह, वाम दलों के तीन, आईआईपी के एक। इसके अलावा एआईएमआईएम के पांच और बसपा के एक विधायक विपक्ष में हैं। कुल 41। यह कमजोरी कटौती प्रस्ताव पर साफ झलकी।

द्वितीय अनुपूरक बजट पर कटौती प्रस्ताव की चर्चा के दौरान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने विपक्ष को कुल 18 मिनट का समय दिया। इस दौरान सभी दलों ने अपनी-अपनी बात रखी, लेकिन एकजुट होकर कोई बड़ा हमला नहीं बोला। राष्ट्रीय जनता दल को नौ मिनट मिले, कांग्रेस को दो, एआईएमआईएम को दो मिनट। सीपीएम, सीपीआई, सीपीआई-एमएल, बसपा और आईआईपी को एक-एक मिनट। अगर ये दल एक साथ आ जाते, तो शायद विरोध की धार तेज होती। लेकिन टुकड़ों में बंटा समय बिखरा हुआ लगा। संख्या इतनी कम कि वोटिंग की मांग ही नहीं की गई। ध्वनिमत पर तो 202 विधायकों का वजन भारी पड़ गया, और 41 की आवाज दब सी गई। नतीजा – विरोध के लिए विरोध। सत्र के इन पांच दिनों में यही पैटर्न दिखा।

सत्र का चौथा दिन विधान परिषद में कुछ अलग रंग लाया। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने विरोध का ऐसा माहौल बनाया कि सदन में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यपाल के अभिभाषण पर सरकार की ओर से बोलने खड़े हुए, तभी विपक्ष ने शोर मचाया। उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधन प्रस्तावों पर बोलने का मौका नहीं दिया गया, और इसे अलोकतांत्रिक बताया। इसके बाद राबड़ी देवी के पीछे-पीछे सभी विपक्षी सदस्य सदन से बाहर चले गए। यह वॉकआउट विपक्ष की नाराजगी का प्रतीक बना, लेकिन संख्या के अभाव में इससे ज्यादा कुछ हासिल न हुआ। सत्र की शुरुआत 1 दिसंबर को हुई, जब सभी नए सदस्यों ने शपथ ली। दूसरे दिन स्पीकर चुने गए, तीसरे दिन राज्यपाल का संयुक्त सत्र संबोधन, चौथे दिन धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस और पांचवें दिन अनुपूरक बजट की चर्चा। हर दिन सत्ता पक्ष का दबदबा साफ दिखा।
यह सत्र बिहार की राजनीति का आईना है। एनडीए की 202 बनाम 41 की लड़ाई में विपक्ष के पास हंगामा और बहस के अलावा कोई हथियार नहीं। कटौती प्रस्ताव जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा भी ध्वनिमत पर ही गुजर गया। आने वाले सत्रों में भी यही सीन दोहराया जाएगा। विपक्ष को अपनी संख्या बढ़ाने या एकजुट होने की जरूरत है, वरना सदन में उनकी आवाज सिर्फ शोर तक सीमित रहेगी। बिहार के लोग देख रहे हैं कि लोकतंत्र में संख्या ही निर्णायक है। उम्मीद है कि विपक्ष इस सबक से सीखेगा और मजबूत बनेगा।
jansancharbharat.com पर पढ़ें ताजा एंटरटेनमेंट, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइस्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और हर खबर की अपडेट के लिए जनसंचार भारत को होम पेज पर जोड़ कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
Discover more from Jansanchar Bharat
Subscribe to get the latest posts sent to your email.







