पटना, 10 दिसंबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की धूलफुंक अभी ठीक से जम नहीं पाई थी कि राजनीतिक गलियारों में एक नई हलचल मच गई है। एनडीए की प्रचंड जीत के बाद बनी नई सरकार में सब कुछ शांत लग रहा था, लेकिन अचानक जदयू और AIMIM के बीच करीबी ने पुरानी यादें ताजा कर दी हैं। क्या नीतीश कुमार की पार्टी फिर से ‘खेला’ करने की तैयारी में है? AIMIM के विधायकों की हालिया मुलाकात ने इस चर्चा को हवा दे दी है। बिहार की राजनीति, जो हमेशा से उतार-चढ़ाव की मिसाल रही है, एक बार फिर गरमाती नजर आ रही है। आइए, समझते हैं इसकी जड़ें क्या हैं।
पहले तो चुनावी नतीजों पर नजर डालें। नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनावों में एनडीए ने रिकॉर्ड 202 सीटें हासिल कीं, जो 243 सदस्यीय सदन में भारी बहुमत है। इसमें बीजेपी ने सबसे ज्यादा 89 सीटें जीतीं, जबकि नीतीश कुमार की जदयू को 85 सीटें मिलीं। बाकी सहयोगी दलों का योगदान भी कम नहीं – एलजेपी(आर) को 19, हम को 5 और आरएलएम को 4 सीटें। विपक्षी महागठबंधन को महज 35 सीटें ही नसीब हुईं, जिसमें आरजेडी की 25 सीटें प्रमुख हैं। यह जीत एनडीए के लिए ऐतिहासिक थी, क्योंकि इससे नीतीश कुमार ने पांचवीं बार मुख्यमंत्री पद संभाला। लेकिन यही मजबूत दिखने वाली सरकार अब अंदर ही अंदर हिलने की अफवाहों से घिर गई है।

चर्चा की शुरुआत हुई 8 दिसंबर को, जब AIMIM के तीन विधायकों ने पटना में नीतीश कुमार से मुलाकात की। इनमें पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान भी शामिल थे। मुलाकात के दौरान विधायकों ने अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों की समस्याओं पर बात की – जैसे विकास कार्यों में देरी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताएं। अख्तरुल इमान ने कहा, “हमने मुख्यमंत्री जी को क्षेत्रीय मुद्दों से अवगत कराया। विकास और न्याय की बात हुई।” लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। एक विधायक मुर्शिद आलम ने खुलकर कहा, “नीतीश कुमार मेरे राजनीतिक गुरु हैं। उनकी नीतियां हमें प्रेरित करती हैं।” यह बयान सुनते ही राजनीतिक हलकों में सनसनी फैल गई। क्या यह सामान्य सौजन्य मुलाकात थी या गठबंधन बदलने का संकेत?
AIMIM ने इस चुनाव में 5 सीटें जीतीं, जो मुख्य रूप से सीमांचल क्षेत्र से हैं। ये विधायक विपक्ष में बैठे हैं, लेकिन एनडीए के बहुमत के आगे उनकी भूमिका सीमित लगती है। फिर भी, अगर ये जदयू में शामिल हो जाते हैं, तो सरकार की मजबूती बढ़ेगी और बीजेपी पर दबाव भी। याद कीजिए, 2020 के चुनाव के बाद AIMIM के चार विधायकों ने आरजेडी का दामन थाम लिया था। अब उसी तर्ज पर जदयू की ओर झुकाव की अफवाहें जोर पकड़ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि नीतीश कुमार का इतिहास ही इसकी वजह है। वे कई बार गठबंधन बदल चुके हैं – कभी आरजेडी के साथ, कभी बीजेपी के। इस बार बीजेपी की मजबूत स्थिति देखते हुए जदयू को लग सकता है कि AIMIM के समर्थन से अल्पसंख्यक वोट बैंक मजबूत हो जाएगा।

लेकिन सवाल यह भी है कि AIMIM क्यों ऐसा कदम उठाएगी? असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने हमेशा मुस्लिम हितों पर जोर दिया है। नीतीश सरकार के सुशासन मॉडल में अल्पसंख्यक कल्याण योजनाएं हैं, जो AIMIM विधायकों को आकर्षित कर सकती हैं। मुलाकात में उन्होंने विकास पर जोर दिया, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बीजेपी के साथ नीतीश के गठबंधन से असहजता का नतीजा हो सकता है। विपक्षी दल आरजेडी ने इसे ‘एनडीए का नया ड्रामा’ बताते हुए कहा कि नीतीश की साख पर सवाल उठे हैं। एक वरिष्ठ आरजेडी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह पुरानी चाल है। AIMIM विधायक जल्द ही जदयू में शामिल हो सकते हैं, जैसे पहले आरजेडी में हुए थे।”
यह चर्चा बिहार की राजनीति को नई ऊंचाई दे रही है। एनडीए के अंदर बीजेपी और जदयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर पहले से ही खींचतान की खबरें हैं। अगर AIMIM का समर्थन मिला, तो नीतीश की कुर्सी और मजबूत हो जाएगी, लेकिन बीजेपी को यह पसंद न आए। आम जनता के लिए यह सब राजनीतिक बाजीगरी लगती है, लेकिन विकास की राह में बाधा भी बन सकती है। फिलहाल, दोनों पक्ष चुप्पी साधे हैं, लेकिन आगामी दिनों में बड़ा ऐलान हो सकता है। बिहार की जनता अब इंतजार कर रही है – क्या यह सिर्फ अफवाह है या नया राजनीतिक समीकरण बनने वाला है?
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