पटना, 26 फरवरी 2026: बिहार विधानसभा के शून्यकाल में बक्सर जिले के पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया। विधायक ने सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया कि जिले में CSD कैंटीन, जिला सैनिक बोर्ड, ECHS क्लिनिक और सैनिक विश्राम गृह के निर्माण के लिए लगभग 50 डिसमिल भूमि की तत्काल आवश्यकता है। यह मांग न केवल सैनिकों के कल्याण से जुड़ी है, बल्कि जिले के विकास और सामाजिक न्याय के व्यापक दायरे को भी छूती है। सदन में हुई इस चर्चा ने पूर्व सैनिकों के बीच उम्मीद जगाई है कि जल्द ही ठोस कदम उठाए जाएंगे।

शून्यकाल के दौरान विधायक ने विस्तार से बताया कि बक्सर जिले में सैकड़ों पूर्व सैनिक और उनके आश्रित परिवार रहते हैं, जो देश की सेवा के बाद अब स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य सुविधाओं के अभाव में जूझ रहे हैं। CSD कैंटीन की कमी के कारण उन्हें दैनिक जरूरतों की चीजें महंगी पड़ती हैं, जबकि जिला सैनिक बोर्ड न होने से पेंशन, मेडिकल और अन्य लाभों का समुचित वितरण नहीं हो पा रहा। ECHS क्लिनिक की अनुपस्थिति में वे दूर के अस्पतालों पर निर्भर हैं, जो यात्रा और इलाज दोनों में कठिनाई पैदा करती है। सैनिक विश्राम गृह न होने से आने-जाने वाले सैनिकों और परिवारों को ठहरने की व्यवस्था का अभाव है। इन सभी सुविधाओं के लिए 50 डिसमिल भूमि का चयनित स्थान उपलब्ध है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर आवंटन में देरी हो रही है।

यह मुद्दा उठाने के पीछे का आधार बक्सर जिले की सैनिक आबादी का महत्व है। जिले से बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती होते हैं, और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का हक है। विधानसभा में कहा गया कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रही ‘सैनिक कल्याण’ योजनाओं को स्थानीय स्तर पर लागू करने के लिए ऐसी बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं। भूमि आवंटन से न केवल निर्माण कार्य तेज होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। निर्माण के दौरान मजदूरी और सामग्री आपूर्ति से छोटे व्यापारियों को फायदा होगा, जो जिले की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।
सरकार की ओर से सदन में प्रतिक्रिया दी गई कि इस मांग को गंभीरता से लिया जा रहा है। संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि भूमि सर्वेक्षण और आवंटन की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा किया जाए। बिहार सरकार की ‘एक जिला एक उत्पाद’ जैसी योजनाओं के साथ सैनिक कल्याण को जोड़ने की बात भी हुई, ताकि पूर्व सैनिकों को कौशल विकास और स्वरोजगार के अवसर मिल सकें। यह कदम न केवल संवैधानिक दायित्वों का पालन होगा, बल्कि सैनिकों के मनोबल को भी ऊंचा रखेगा।

बक्सर जैसे सीमावर्ती जिलों में सैनिकों की संख्या अधिक होने से यह मुद्दा और भी प्रासंगिक हो जाता है। स्थानीय स्तर पर पूर्व सैनिक संगठनों ने भी इस चर्चा का स्वागत किया है। उनका कहना है कि ऐसी सुविधाएं मिलने से परिवारों का बोझ कम होगा और वे समाज में सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे। विधानसभा की इस पहल से जिले के अन्य क्षेत्रों में भी समान मांगें उठ सकती हैं, जो राज्यव्यापी सैनिक कल्याण को मजबूत बनाएगी।

आज के दौर में जब स्वास्थ्य और कल्याण सेवाएं हर नागरिक का अधिकार हैं, तो पूर्व सैनिकों के लिए विशेष प्रावधान न होना एक कमी है। इस शून्यकाल चर्चा ने न केवल समस्या को उजागर किया, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाई। यदि भूमि आवंटन जल्द होता है, तो निर्माण कार्य अगले कुछ महीनों में शुरू हो सकता है। बक्सर के निवासियों को उम्मीद है कि सरकार का वादा कागजों से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत बनेगा। यह घटना दर्शाती है कि विधानसभा जैसे मंच लोकहित के मुद्दों को कितनी प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं।
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