Header Banner for support us by sending some ammount to provide better news

श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन गोसाईंपुर में उमड़ी भक्तों की भीड़, कृष्ण लीलाओं ने बांधा सबको

Join Now
Subscribe

बक्सर, 24 फरवरी 2026: बक्सर जिले के गोसाईंपुर गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन भक्ति का ऐसा संगम देखने को मिला कि पूरा इलाका हरि नाम के रस में डूब गया। सुबह से ही सैकड़ों श्रद्धालु कथा स्थल पर पहुंचे, जहां आचार्य रणधीर ओझा ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का जीवंत वर्णन किया। कथा के माध्यम से भक्तों को न केवल धार्मिक ज्ञान मिला, बल्कि जीवन के सरल सिद्धांतों पर भी विचार करने का अवसर मिला। यह आयोजन गांव की एकता और आस्था का प्रतीक बन गया है, जहां हर उम्र के लोग एक साथ बैठकर पुराण की शिक्षाओं को ग्रहण कर रहे हैं।

Advertisements

कथा का मुख्य आकर्षण श्रीकृष्ण की उन लीलाओं का चित्रण रहा, जो बाल सुलभता और दिव्यता का अनोखा मेल दर्शाती हैं। आचार्य ओझा ने सबसे पहले माखन चोरी की लीला का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि ब्रज के बालकृष्ण का नटखट स्वभाव ही उनकी सबसे बड़ी पहचान था। मां यशोदा के पास रोजाना ग्वालों की शिकायतें आतीं कि कान्हा माखन चुरा लेते हैं। लेकिन जब यशोदा उनसे पूछतीं, तो कान्हा मुस्कुराते हुए अपना मुख खोलकर कहते, “मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो।” यह दृश्य इतना मनोहारी था कि कथा स्थल पर बैठे श्रद्धालु खुद को हंसने और भावुक होने से रोक नहीं पाए। आचार्य ने जोर देकर कहा कि यह लीला हमें सिखाती है कि ईश्वर का प्रेम भी इतना सरल और निश्छल होता है, जैसे एक बच्चे की शरारतें।

Join Now
Advertisements

इसके बाद कथा में कालियामर्दन प्रसंग आया, जो साहस और न्याय की मिसाल पेश करता है। आचार्य ओझा ने वर्णन किया कि यमुना नदी में कालिया नाग के विषैले आतंक से ब्रजवासी त्रस्त थे। नदी का पानी जहरीला हो चुका था, और लोग डर के मारे नदी के किनारे भी नहीं जा पाते थे। तब मात्र सात वर्ष की आयु के बालकृष्ण ने कदंब वृक्ष पर चढ़कर यमुना में छलांग लगा दी। उन्होंने कालिया पर नृत्य करते हुए अपना दमन किया और नाग को यमुना से बाहर निकाल दिया। इस घटना से ब्रज में खुशी की लहर दौड़ गई। आचार्य ने कहा, “यह लीला हमें बताती है कि अधर्म का अंत हमेशा धर्म की जीत से होता है। छोटी उम्र में भी सच्चा साहस दुनिया बदल सकता है।” श्रद्धालुओं ने इस प्रसंग पर जोरदार ताली बजाई, और कईयों की आंखों में श्रद्धा के आंसू छलक पड़े।

Advertisements

गोवर्धन पूजा का प्रसंग कथा का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। आचार्य ने बताया कि ब्रजवासी वर्षा ऋतु में इंद्र देव की पूजा की तैयारी कर रहे थे। लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि प्रकृति के प्रतीक गोवर्धन पर्वत की पूजा अधिक उचित है। जब इंद्र क्रोधित होकर सात दिनों तक मूसलाधार वर्षा करने लगे, तो कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर ही गोवर्धन पर्वत उठा लिया। इस तरह पूरे ब्रज की रक्षा हुई। अंत में इंद्र को अपनी भूल का पछतावा हुआ, और उन्होंने वर्षा रोक दी। ब्रज में जयकारों की गूंज फैल गई। आचार्य ओझा ने इस लीला से जोड़ते हुए कहा, “यह हमें पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान की सीख देती है। आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है, यह प्रसंग और भी प्रासंगिक लगता है।”

Advertisements

कथा के अंतिम चरण में गोपियों की रासलीला पर चर्चा हुई, जो प्रेम योग की मिसाल है। आचार्य ने कहा कि बड़े-बड़े ज्ञानी भगवान को पाने के लिए कठिन तपस्या करते हैं, लेकिन सरल हृदय वाली गोपियां प्रेम के बल पर ही कृष्ण को प्राप्त कर लेती हैं। रासलीला में कृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम बिना किसी अपेक्षा के होता है। उन्होंने जोर दिया कि कलयुग में हरि नाम का जाप ही कल्याण का सबसे सरल मार्ग है। “भागवत कथा विचार, वैराग्य और ज्ञान का खजाना है। लोभ-लालच से दूर रहकर परमार्थ की राह अपनाएं, तो जीवन आनंदमय हो जाता है।” उनके इन शब्दों ने श्रद्धालुओं के मन को छू लिया, और कई ने संकल्प लिया कि वे रोजाना हरि नाम का स्मरण करेंगे।

Follow Us
Advertisements
Web Hosting by Hostinger

यह कथा आयोजन गोसाईंपुर गांव के लिए एक विशेष महत्व रखता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ऐसे धार्मिक कार्यक्रम गांव में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। कथा के दौरान भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण ने माहौल को और भक्तिमय बना दिया। आचार्य ओझा ने समापन पर सभी से अपील की कि भागवत की शिक्षाओं को दैनिक जीवन में उतारें। कलयुग की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह कथा एक शांतिदायक द्वीप की तरह लगी। आयोजकों के अनुसार, कथा का अंतिम दिन कल होगा, जहां और भी गहन प्रसंग सुनने को मिलेंगे।

Advertisements

गोसाईंपुर जैसे छोटे गांवों में ऐसे आयोजन न केवल आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि सामुदायिक बंधन को भी बढ़ाते हैं। यहां की भागवत कथा ने स्थानीय स्तर पर ही नहीं, पूरे जिले में चर्चा पा ली है। श्रद्धालु दूर-दूर से आ रहे हैं, जो दर्शाता है कि भक्ति का संदेश सीमाओं से परे होता है। यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि धार्मिक ग्रंथों में छिपी सीखें आज भी समस्याओं का समाधान दे सकती हैं। यदि आप भी इस कथा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो कल अंतिम दिन अवश्य पधारें।

Advertisements

Discover more from Jansanchar Bharat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

You cannot copy content of this page

Discover more from Jansanchar Bharat

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading