बक्सर, 10 दिसंबर 2025: न्याय की देवी कभी सोती नहीं, बस इंतजार करती है सही समय का। बक्सर की अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय मनीष कुमार शुक्ला की अदालत ने ठीक यही साबित किया है। नौ साल पुराने एक क्रूर हत्या के मामले में जिला परिषद सदस्य प्रतिनिधि रिंकू यादव सहित चार अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई। यह फैसला न सिर्फ पीड़ित परिवार के लिए इंसाफ की आस बनेगा, बल्कि इलाके में कानून के राज को मजबूत करने का संदेश भी देगा। अदालत ने साफ कहा कि यह मामला ‘रेयर ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए सजा में अतिरिक्त कठोरता नहीं बरती गई, लेकिन दोषियों को कड़ी सजा से कोई छूट नहीं मिली।
यह प्रकरण बक्सर नगर थाना कांड संख्या 382/2016 से जुड़ा है। साल 2016 में जमीन के कारोबार से जुड़े पैसे के लेन-देन को लेकर हुए विवाद ने एक परिवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया। मृतक व्यक्ति की पत्नी इंदू सिंह के फर्दबयान पर मामला दर्ज हुआ था। उन्होंने बताया था कि राशि लौटाने को लेकर तनाव इतना बढ़ गया कि अभियुक्तों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस की जांच और गवाहों के बयानों के आधार पर चारों – रिंकू यादव, अजय कुमार पांडेय, चतुरी भर और जयराम पासवान – के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हुआ। साजिश, हत्या, आर्म्स एक्ट और गंभीर चोट पहुंचाने की धाराओं में मुकदमा चला।

अदालत ने अभियोजन पक्ष के दस गवाहों की गवाही को आधार बनाते हुए सभी आरोप साबित माने। रिंकू यादव, जो जिप सदस्य प्रतिनिधि थे, पर तो इलाके में खास नजर थी। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के बावजूद अदालत ने कोई भेदभाव नहीं किया। सजा के तहत धारा 302 (हत्या) में उम्रकैद और एक-एक लाख रुपये जुर्माना, धारा 326 (गंभीर चोट) में 10 वर्ष का सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माना, तथा आर्म्स एक्ट की धारा 27 में चार वर्ष का सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। अगर जुर्माना नहीं भरा, तो प्रत्येक में अतिरिक्त छह माह का साधारण कारावास काटना होगा।
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न्याय की इस प्रक्रिया में अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत विचारण के दौरान जेल में बिताई अवधि को सजा में समायोजित करने का आदेश दिया। रिकॉर्ड बताते हैं कि रिंकू यादव ने 3 माह, अजय कुमार पांडेय ने 3 माह 19 दिन, चतुरी भर ने 1 वर्ष 1 माह 11 दिन, और जयराम पासवान ने 4 माह 11 दिन जेल में गुजारे। यह समायोजन दोषियों को थोड़ी राहत देगा, लेकिन उम्रकैद की सजा उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल देगी।

फैसले के साथ अदालत ने पीड़ित पक्ष – सूचिका इंदू सिंह और उनके बच्चों – को मुआवजा देने की सिफारिश भी की। इसकी प्रति जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भेज दी गई है। इंदू सिंह जैसे परिवार के लिए यह इंसाफ सिर्फ सजा नहीं, बल्कि खोए हुए सहारे की वापसी जैसा है। नौ साल का इंतजार, कोर्ट की दौड़-भाग, और हर सुनवाई पर लगने वाला तनाव – सब कुछ अब थोड़ा हल्का लगेगा। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सजा भविष्य में ऐसे विवादों को रोक पाएगी? जमीन और पैसे के लेन-देन में अक्सर छोटे झगड़े बड़े रूप ले लेते हैं। बक्सर जैसे जिले में, जहां विकास तेजी से हो रहा है, ऐसे मामलों पर सतर्कता जरूरी है।
फैसला आने के बाद इलाके में चर्चा का बाजार गर्म हो गया। लोग कह रहे हैं कि न्याय हुआ, लेकिन देर से। जिप सदस्य प्रतिनिधि जैसे प्रभावशाली व्यक्ति का दोषी ठहरना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है। उम्मीद है कि यह फैसला न सिर्फ पीड़ितों को ताकत देगा, बल्कि समाज को भी सोचने पर मजबूर करेगा कि विवादों को हिंसा की राह न अपनाएं। बक्सर की अदालत ने एक बार फिर साबित किया कि कानून सबके लिए बराबर है।
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